कागजी जंगल और रिकॉर्ड तोड़ दावे: हर साल रोपे जाने वाले लाखों-करोड़ पौधे आखिर जाते कहां हैं?
जून-जुलाई का महीना आते ही उत्तर प्रदेश में एक उत्सव बहुत जोर-शोर से शुरू होता है—"वृक्षारोपण महाअभियान"। हर साल दावा किया जाता है कि प्रदेश में एक ही दिन में 25 करोड़, 30 करोड़ या 35 करोड़ पौधे लगा दिए गए। बकायदा इसके लिए सरकारी मशीनरी झोंक दी जाती है, मंत्रियों से लेकर अफसरों तक हाथ में खुरपी और नन्हा सा पौधा थामे कैमरे के सामने मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाते हैं। शाम तक प्रेस नोट जारी होता है कि एक नया रिकॉर्ड बन गया है। लेकिन जैसे ही मॉनसून बीतता है और सर्दियां आती हैं, वे 'रिकॉर्ड तोड़' पौधे गायब हो जाते हैं। अगले साल उसी जगह पर फिर से नया गड्ढा खोदा जाता है और फिर से एक नया रिकॉर्ड दर्ज कर दिया जाता है। सवाल उठता है कि अगर पिछले 5-10 सालों के आंकड़ों को जोड़ दिया जाए, तो उत्तर प्रदेश को अब तक दुनिया का सबसे घना वन क्षेत्र बन जाना चाहिए था। तो फिर हर साल बढ़ती यह जानलेवा गर्मी, सूखते जलस्रोत और कंक्रीट के तपते शहर गवाही क्यों दे रहे हैं कि जमीन पर कुछ नहीं बदला? सरकारी गणित बनाम जमीनी हकीकत: आंकड़ों का मायाजाल अगर हम सरकारी आंकड़ों की बात करें, तो उत्तर प्रदेश...