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सरकारी ऑडिट: ज़मीनी हकीकत या महज़ एक 'फोटो-ऑप' और कागज़ी खानापूर्ति?

आज के दौर में विकास कार्यों और सरकारी योजनाओं का ढिंढोरा पीटना एक आम बात हो चुकी है। सड़क निर्माण से लेकर सरकारी भवनों के जीर्णोद्धार तक, हर छोटे-बड़े काम के पूरे होने पर एक बड़ा सा बोर्ड लगा दिया जाता है। लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि इन कामों की गुणवत्ता और पारदर्शिता को परखने के लिए जो 'ऑडिट' (Audit) व्यवस्था बनाई गई थी, आज उसकी खुद की क्या साख बची है? ​आज की कड़वी सच्चाई यह है कि सरकारी कामों का ऑडिट महज़ एक औपचारिकता (Formality) और 'फोटो खिंचवाने' (Photo Opportunity) का जरिया बनकर रह गया है। ज़मीन पर काम की गुणवत्ता भगवान भरोसे होती है, जबकि कागज़ों पर उसे 'सौ फीसदी परफेक्ट' साबित कर दिया जाता है। ​1. 'फाइल और फोटो' संस्कृति: जहां कागज़ चमकते हैं, काम नहीं ​आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था में 'ऑडिट' का मतलब अब गहराई से जांच करना नहीं, बल्कि फाइलें दुरुस्त करना हो गया है। जब भी कोई ऑडिट टीम आती है, तो पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि: ​ दस्तावेज़ों की खानापूर्ति: वाउचर, रसीदें और रजिस्टर मेंटेन हैं या नहीं। अगर कागज़ी आंकड़े आपस में मेल ...