सरकारी ऑडिट: ज़मीनी हकीकत या महज़ एक 'फोटो-ऑप' और कागज़ी खानापूर्ति?
आज के दौर में विकास कार्यों और सरकारी योजनाओं का ढिंढोरा पीटना एक आम बात हो चुकी है। सड़क निर्माण से लेकर सरकारी भवनों के जीर्णोद्धार तक, हर छोटे-बड़े काम के पूरे होने पर एक बड़ा सा बोर्ड लगा दिया जाता है। लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि इन कामों की गुणवत्ता और पारदर्शिता को परखने के लिए जो 'ऑडिट' (Audit) व्यवस्था बनाई गई थी, आज उसकी खुद की क्या साख बची है?
आज की कड़वी सच्चाई यह है कि सरकारी कामों का ऑडिट महज़ एक औपचारिकता (Formality) और 'फोटो खिंचवाने' (Photo Opportunity) का जरिया बनकर रह गया है। ज़मीन पर काम की गुणवत्ता भगवान भरोसे होती है, जबकि कागज़ों पर उसे 'सौ फीसदी परफेक्ट' साबित कर दिया जाता है।
1. 'फाइल और फोटो' संस्कृति: जहां कागज़ चमकते हैं, काम नहीं
आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था में 'ऑडिट' का मतलब अब गहराई से जांच करना नहीं, बल्कि फाइलें दुरुस्त करना हो गया है। जब भी कोई ऑडिट टीम आती है, तो पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि:
- दस्तावेज़ों की खानापूर्ति: वाउचर, रसीदें और रजिस्टर मेंटेन हैं या नहीं। अगर कागज़ी आंकड़े आपस में मेल खा रहे हैं, तो मान लिया जाता है कि काम पूरी ईमानदारी से हुआ है।
- तस्वीरों का खेल: निरीक्षण के नाम पर चमचमाती हुई साइट या किसी एक कोने को चुनकर अधिकारियों और ठेकेदारों की मुस्कुराती हुई तस्वीरें खींची जाती हैं। इन तस्वीरों को 'प्रगति' और 'सफलता' के सबूत के तौर पर सरकारी पोर्टल्स और सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया जाता है।
2. ज़मीनी स्तर पर क्या है इस व्यवस्था का लूपहोल?
इस 'दिखावे' वाले ऑडिट कल्चर के कारण सरकारी धन का भारी नुकसान होता है। इसके मुख्य कारण और तरीके निम्नलिखित हैं:
- गुणवत्ता की अनदेखी: एक सड़क बनती है और छह महीने में उखड़ जाती है। ऑडिट टीम कागज़ पर उसकी मोटाई और सामग्री की मात्रा तो देख लेती है, लेकिन इस्तेमाल किए गए मटीरियल की 'लाइफ' और 'क्वालिटी' की लैब टेस्टिंग या सख्त फिजिकल वेरिफिकेशन अक्सर नदारद रहता है।
- अग्रिम सूचना और 'मैनेज्ड' निरीक्षण: ज़्यादातर ऑडिट और निरीक्षण पहले से तय (Pre-planned) होते हैं। ठेकेदारों और संबंधित कर्मचारियों को पहले से पता होता है कि टीम कब आने वाली है। ऐसे में सिर्फ उतने हिस्से को चमका दिया जाता है, जहां टीम को जाना होता है।
- नेक्सस (साठगांठ) का असर: कभी-कभी जवाबदेही की कमी और आपसी साठगांठ के कारण ऑडिट महज़ एक रस्म अदायगी बनकर रह जाता है, जहां कमियों को उजागर करने के बजाय उन पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है।
3. इस दिखावे का समाज पर क्या असर पड़ रहा है?
जब ऑडिट सिर्फ फोटो तक सीमित हो जाता है, तो इसका सीधा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है:
- जनता के पैसे की बर्बादी: टैक्सपेयर्स का पैसा उन कामों में बह जाता है जो कुछ ही समय में बेकार हो जाते हैं।
- भ्रष्टाचार को बढ़ावा: जब ठेकेदारों और अधिकारियों को पता होता है कि 'मैनेज' करना आसान है, तो वे काम में लापरवाही बरतने से नहीं हिचकते।
- व्यवस्था से भरोसा उठना: आम नागरिक जब रोज़ाना खराब सड़कों, जर्जर सरकारी दफ्तरों या ठप पड़ी योजनाओं को देखता है, तो उसका प्रशासनिक दावों और ऑडिट रिपोर्ट से भरोसा पूरी तरह उठ जाता है।
4. बदलाव की ज़रूरत: कैसे सुधरेगी व्यवस्था?
अगर वास्तव में सरकारी ऑडिट को सार्थक बनाना है, तो पारंपरिक तरीकों में बदलाव करना होगा:
- सोशल ऑडिट (Social Audit) को अनिवार्य बनाना: काम का ऑडिट सिर्फ बंद कमरों में अधिकारी न करें, बल्कि उस क्षेत्र की जनता, स्थानीय प्रतिनिधियों और लाभार्थियों को शामिल करके खुले मंच पर हो।
- सरप्राइज विजिट और इंडिपेंडेंट थर्ड-पार्टी असेसमेंट: बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक निरीक्षण किए जाएं और जांच की कमान किसी ऐसी स्वतंत्र एजेंसी को दी जाए जिसका उस काम से कोई सीधा हित न जुड़ा हो।
- डिजिटल ट्रैकिंग और जियो-टैगिंग की वास्तविक कड़ाई: तस्वीरों की जियो-टैगिंग तो हो, लेकिन साथ ही एक ऐसा पब्लिक पोर्टल हो जहां आम जनता भी उस काम की वर्तमान स्थिति की तस्वीरें और शिकायतें अपलोड कर सके, और उस पर तुरंत एक्शन लिया जाए।
निष्कर्ष
जब तक ऑडिट की परिभाषा 'फाइलें चमकाने' और 'फोटो खिंचवाने' से बदलकर 'ज़मीनी जवाबदेही तय करने' की नहीं होगी, तब तक सरकारी धन का सही उपयोग मुमकिन नहीं है। प्रशासन को यह समझना होगा कि जनता को कागज़ों की चमक नहीं, बल्कि ज़मीन पर टिकाऊ और मजबूत काम चाहिए।
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