नगर निगमों का ABC प्रोग्राम: जनता के पैसे की बर्बादी या सिर्फ टेंडर कंपनियों का 'स्कैम' ?
सड़कों पर घूमते आवारा कुत्ते, आए दिन बच्चों और बुजुर्गों पर होते हमले और हर कोने से आती रेबीज के खतरे की खबरें—यह आज देश के लगभग हर शहर की कड़वी सच्चाई है। इस समस्या से निपटने के लिए नगर निगमों द्वारा ABC (Animal Birth Control) कार्यक्रम यानी कुत्तों की नसबंदी का अभियान चलाया जाता है। कागजों पर तो यह योजना बेहतरीन दिखती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह कार्यक्रम सिर्फ "जनता के पैसे की बर्बादी" और "टेंडर लेने वाली कंपनियों के फायदे" का जरिया बनकर रह गया है। अगर समय रहते इस व्यवस्था को नहीं सुधारा गया, तो यह सरकारी बजट को डकारने वाला एक बड़ा सफेद हाथी साबित होगा। गणित सीधा है: कछुए की रफ्तार से नहीं थमेगी कुत्तों की आबादी आइए एक सीधा और व्यावहारिक गणित समझते हैं। एक मादा कुत्ता साल में दो बार बच्चे दे सकती है और एक बार में औसतन 4 से 6 बच्चों को जन्म देती है। इस रफ्तार से शहर में हर साल लाखों नए पिल्ले पैदा हो रहे हैं। दूसरी तरफ, हमारे नगर निगम और उनकी टेंडर पाने वाली एजेंसियां साल भर में बमुश्किल 4-5 हजार कुत्तों की सर्जरी कर पाती हैं। जब तक ये एजेंसियां 5...