नगर निगमों का ABC प्रोग्राम: जनता के पैसे की बर्बादी या सिर्फ टेंडर कंपनियों का 'स्कैम' ?


​सड़कों पर घूमते आवारा कुत्ते, आए दिन बच्चों और बुजुर्गों पर होते हमले और हर कोने से आती रेबीज के खतरे की खबरें—यह आज देश के लगभग हर शहर की कड़वी सच्चाई है। इस समस्या से निपटने के लिए नगर निगमों द्वारा ABC (Animal Birth Control) कार्यक्रम यानी कुत्तों की नसबंदी का अभियान चलाया जाता है। कागजों पर तो यह योजना बेहतरीन दिखती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह कार्यक्रम सिर्फ "जनता के पैसे की बर्बादी" और "टेंडर लेने वाली कंपनियों के फायदे" का जरिया बनकर रह गया है।

​अगर समय रहते इस व्यवस्था को नहीं सुधारा गया, तो यह सरकारी बजट को डकारने वाला एक बड़ा सफेद हाथी साबित होगा।

​गणित सीधा है: कछुए की रफ्तार से नहीं थमेगी कुत्तों की आबादी

​आइए एक सीधा और व्यावहारिक गणित समझते हैं। एक मादा कुत्ता साल में दो बार बच्चे दे सकती है और एक बार में औसतन 4 से 6 बच्चों को जन्म देती है। इस रफ्तार से शहर में हर साल लाखों नए पिल्ले पैदा हो रहे हैं।

​दूसरी तरफ, हमारे नगर निगम और उनकी टेंडर पाने वाली एजेंसियां साल भर में बमुश्किल 4-5 हजार कुत्तों की सर्जरी कर पाती हैं। जब तक ये एजेंसियां 5 हजार कुत्तों की नसबंदी पूरी करती हैं, तब तक शहर में लाखों नए कुत्ते पहले ही पैदा हो चुके होते हैं। वैज्ञानिक नियम (WHO Guidelines) कहता है कि अगर आबादी रोकनी है, तो कम से कम 70% कुत्तों की नसबंदी एक सीमित समय के भीतर एक साथ होनी चाहिए। टुकड़ों-टुकड़ों में और धीमी रफ्तार से किया गया काम सिर्फ और सिर्फ पैसों की बर्बादी है, जिसका नतीजा शून्य (Zero) आता है।

​टेंडर कंपनियों की चांदी, जनता का पैसा पानी में

​वर्तमान व्यवस्था में सबसे बड़ा फायदा सिर्फ टेंडर उठाने वाली प्राइवेट एजेंसियों या एनजीओ (NGOs) को मिल रहा है। प्रति कुत्ता नसबंदी और टीकाकरण के नाम पर एक मोटी रकम तय होती है।

  • कागजी खानापूर्ति: कई बार सिर्फ कागजों पर संख्या दिखाकर बिल पास करा लिए जाते हैं।
  • निगरानी का अभाव: क्या वाकई सही तरीके से सर्जरी हुई? क्या कुत्ते को एंटी-रेबीज वैक्सीन लगी? इसकी क्रॉस-चेकिंग करने वाला कोई स्वतंत्र सरकारी सिस्टम या मजबूत विजिलेंस टीम मैदान में नहीं होती।
  • परिणाम शून्य: सालों से करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी सड़कों पर आवारा कुत्तों की संख्या घटने के बजाय लगातार बढ़ रही है। आम जनता आज भी रात में सड़क पर निकलने से डरती है।

​समाधान क्या है? या तो रोक लगे या फिर 'मिशन मोड' में हो काम

​अगर इस व्यवस्था से जनता को राहत नहीं मिल रही है, तो इस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए या फिर इसमें आमूलचूल बदलाव किए जाने चाहिए। खानापूर्ति बंद करके सरकार को निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:

  1. कम से कम 10 से 20 टीमें मैदान में हों: किसी भी बड़े नगर निगम क्षेत्र में एक या दो टीमों से काम नहीं चलेगा। शहर के आकार के हिसाब से कम से कम 15-20 सक्रिय टीमें होनी चाहिए, जो हर वार्ड में एक साथ धावा बोलें।
  2. वार्ड-वाइज 'मास स्टेरलाइजेशन': टुकड़ों में काम करने के बजाय एक-एक वार्ड या जोन को टारगेट किया जाए। जब तक एक वार्ड के 80-90% कुत्तों की नसबंदी न हो जाए, टीम अगले वार्ड में न बढ़े।
  3. कड़ा सुपरविजन और जियो-टैगिंग: जिस कुत्ते को पकड़ा जाए, उसकी फोटो, लोकेशन (जियो-टैगिंग) और कान पर लगे कट (Ear Notch) की लाइव मॉनिटरिंग हो। सरकारी डॉक्टरों की एक स्वतंत्र टीम रैंडम चेकिंग करे कि टेंडर कंपनी सही काम कर रही है या नहीं।
  4. जनता की भागीदारी और डैशबोर्ड: नगर निगम एक पब्लिक डैशबोर्ड बनाए, जहां रोज का डेटा लाइव हो कि आज किस वार्ड से कितने कुत्ते पकड़े गए और कितनों की सर्जरी हुई।

​निष्कर्ष

​जनता का टैक्स का पैसा किसी कंपनी की तिजोरी भरने के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा और शहर की व्यवस्था सुधारने के लिए है। सिर्फ नाम के लिए 'एनिमल बर्थ कंट्रोल' का ढोंग बंद होना चाहिए। यदि नगर निगमों के पास पर्याप्त टीमें और इच्छाशक्ति नहीं है, तो इस बजट को बर्बाद करने से बेहतर है कि इस पर रोक लगाकर एक नई, पारदर्शी और आक्रामक नीति बनाई जाए।

अब समय आ गया है कि जनता अपने टैक्स के एक-एक पैसे का हिसाब मांगे!

  • ​ "Poll" (मतदान) - "क्या आपके क्षेत्र में नगर निगम का कुत्ता नसबंदी कार्यक्रम सफल है? हाँ / नहीं"

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