वीआईपी (VIP) दौरा: लोकतंत्र का उत्सव या आम जनता की जेब पर भारी खर्च?
जब भी देश के प्रधानमंत्री या किसी राज्य के मुख्यमंत्री का किसी जिले या क्षेत्र में दौरा होता है, तो पूरा प्रशासनिक अमला अलर्ट मोड पर आ जाता है। सड़कों की मरम्मत रातों-रात हो जाती है, सुरक्षा के अभेद्य इंतजाम किए जाते हैं, और एक बड़ा सा तामझाम दिखाई देता है। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक बड़ा सवाल हमेशा तैरता रहता है—इस पूरे दौरे में कितना पैसा खर्च होता है और यह पैसा किसकी जेब से जाता है?
आइए इस पूरे तंत्र, इसके पीछे होने वाले खर्च और इसके बजटीय गणित को विस्तार से समझते हैं।
1. वीआईपी दौरे में कहाँ-कहाँ खर्च होता है? (खर्च के मुख्य घटक)
एक मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के दौरे को सफल बनाने के लिए कई विभागों को एक साथ मिलकर काम करना पड़ता है। इसमें होने वाले खर्चों को मुख्य रूप से इन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- सुरक्षा व्यवस्था (Security): यह सबसे बड़ा और सबसे खर्चीला हिस्सा होता है। प्रधानमंत्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी SPG (Special Protection Group) के पास होती है, जबकि मुख्यमंत्रियों की सुरक्षा में स्टेट पुलिस, एंटी-टेरर स्क्वाड (ATS) और केंद्रीय बल तैनात होते हैं। दौरे से कई दिन पहले ही एडवांस सिक्योरिटी संपर्क (ASL) शुरू हो जाता है। सैकड़ों-हजारों पुलिसकर्मियों की तैनाती, उनके रहने-खाने का खर्च, और सुरक्षा उपकरणों का इंतजाम इसमें शामिल होता है।
- यातायात और लॉजिस्टिक्स (Transportation): वीआईपी के लिए विशेष विमान, हेलीकॉप्टर (कई बार वायुसेना के हेलीकॉप्टर), बुलेटप्रूफ गाड़ियां, और पूरे काफिले (Convoy) के ईंधन का खर्च। इसके अलावा, कई बार सुरक्षा कारणों से रूट डायवर्ट करने और बैरिकेडिंग लगाने में भारी खर्च आता है।
- मंच, पांडल और जनसभा (Infrastructure & Venue): अगर दौरा किसी सार्वजनिक जनसभा या उद्घाटन के लिए है, तो वॉटरप्रूफ पंडाल, जर्मन हैंगर (आधुनिक टेंट), बड़ा स्टेज, हाई-टेक साउंड सिस्टम, एलईडी स्क्रीन और वीआईपी लाउंज बनाए जाते हैं।
- प्रशासनिक और सौंदर्यीकरण कार्य: वीआईपी के आने वाले रास्ते की सड़कों पर रातों-रात पैचवर्क (मरम्मत) होना, डिवाइडरों की पुताई, नए पेड़-पौधे लगाना, और चप्पे-चप्पे की सफाई।
- भीड़ जुटाने और प्रचार का खर्च: सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को बसों में भरकर रैली स्थल तक लाना, उनके खाने-पीने के पैकेट और अखबारों/होर्डिंग्स में दौरे के विज्ञापन का खर्च।
2. कितना पैसा खर्च होता है? (अनुमानित आंकड़ा)
यह खर्च इस बात पर निर्भर करता है कि दौरा किस स्तर का है और कार्यक्रम कितना बड़ा है।
- मुख्यमंत्री का सामान्य दौरा: किसी राज्य के मुख्यमंत्री के एक जिले के सामान्य दौरे पर (बिना बड़ी रैली के) औसतन ₹20 लाख से ₹50 लाख तक का खर्च आ सकता है। लेकिन अगर कोई बड़ी जनसभा या बड़ी सरकारी योजना का शुभारंभ है, तो यह आंकड़ा ₹2 करोड़ से ₹5 करोड़ या उससे भी अधिक हो सकता है।
- प्रधानमंत्री का दौरा: प्रधानमंत्री की सुरक्षा और प्रोटोकॉल बेहद कड़े होते हैं। एक आधिकारिक रिपोर्ट और आरटीआई (RTI) से समय-समय पर सामने आई जानकारियों के अनुसार, प्रधानमंत्री के एक दिवसीय दौरे (जिसमें बड़ी रैली और उद्घाटन शामिल हों) का खर्च ₹5 करोड़ से लेकर ₹20 करोड़ (या उससे भी ज्यादा) तक जा सकता है। इसमें सुरक्षा बलों की लॉजिस्टिक्स और वायुसेना के विमानों का प्रति घंटा उड़ान खर्च भी शामिल होता है।
3. यह करोड़ों रुपए किसकी जेब से जाते हैं?
इसका सीधा और साफ जवाब है—यह पैसा देश और राज्य के आम नागरिकों (Taxpayers) की जेब से जाता है।
इसे तकनीकी रूप से "सरकारी खजाना" (Consolidated Fund of India / State) कहा जाता है। इस खजाने में पैसा कहाँ से आता है?
- प्रत्यक्ष कर (Direct Taxes): जो लोग अपनी कमाई पर इनकम टैक्स (Income Tax) या कॉर्पोरेट टैक्स देते हैं।
- अप्रत्यक्ष कर (Indirect Taxes): यह सबसे महत्वपूर्ण है। देश का हर नागरिक—चाहे वह एक गरीब मजदूर हो जो ₹5 का पारले-जी बिस्कुट खरीद रहा है, या कोई अमीर व्यक्ति जो गाड़ी खरीद रहा है—GST (वस्तु एवं सेवा कर) और वैट (VAT) के रूप में सरकार को टैक्स देता है।
यानी, उस रैली या दौरे पर होने वाले खर्च का एक-एक पैसा सीधे तौर पर जनता के खून-पसीने की कमाई से टैक्स के रूप में जुटाया गया पैसा होता है।
4. क्या यह खर्च कानूनी और जायज है? (नियम क्या कहते हैं?)
यहाँ यह समझना जरूरी है कि दौरों को दो भागों में बांटा जाता है:
- आधिकारिक/सरकारी दौरा (Official Visit): जब मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री किसी सरकारी योजना का शिलान्यास करने, विकास कार्यों की समीक्षा करने, या आपदा क्षेत्र का दौरा करने जाते हैं। इसका पूरा खर्च सरकारी बजट (जनता के टैक्स) से दिया जाता है, क्योंकि वे राज्य या देश के प्रधान के तौर पर अपनी ड्यूटी कर रहे होते हैं।
- चुनावी/राजनीतिक दौरा (Political Visit): जब चुनाव के समय वे अपनी पार्टी के प्रचार के लिए जाते हैं। चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक, राजनीतिक दौरों का खर्च (जैसे मंच, लाउडस्पीकर, भीड़ जुटाना) संबंधित राजनीतिक दल को उठाना पड़ता है। हालांकि, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों की सुरक्षा का खर्च चुनावी दौरे में भी सरकार (यानी टैक्सपेयर्स) को ही उठाना पड़ता है, क्योंकि उनकी सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता।
5. वीआईपी कल्चर का सबसे बड़ा शिकार: आम इंसान और जाम का दर्द
करोड़ों रुपए के वित्तीय खर्च से अलग, एक ऐसा 'अदृश्य खर्च' और नुकसान भी है जिसे देश का आम नागरिक अपनी मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से चुकाता है। जब भी किसी वीआईपी का रूट तय होता है, तो सुरक्षा के नाम पर पूरे शहर का रोड डायवर्जन (Route Diversion) कर दिया जाता है, जिसके परिणाम बेहद गंभीर होते हैं:
- जाम में फंसती जिंदगी और एम्बुलेंस का संकट: कई बार वीआईपी का काफिला गुजरने से आधा या एक घंटा पहले ही मुख्य रास्तों और चौराहों को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया जाता है। इस नाकेबंदी में सबसे ज्यादा खौफनाक मंजर तब होता है जब कोई एम्बुलेंस मरीज को लेकर जाम में फंस जाती है। महज कुछ मिनटों के इस वीआईपी प्रोटोकॉल की वजह से कई बार समय पर अस्पताल न पहुंच पाने के कारण मरीज दम तोड़ देते हैं। सुरक्षा के नाम पर आम इंसान की जिंदगी दांव पर लगा दी जाती है।
- स्कूली बच्चों की परेशानी: दोपहर या सुबह के वक्त जब वीआईपी मूवमेंट होता है, तो स्कूल बसें और वैन घंटों जाम में फंसी रहती हैं। भूखे-प्यासे छोटे बच्चे चिलचिलाती धूप या कड़कड़ाती ठंड में गाड़ियों के अंदर कैद रहने को मजबूर हो जाते हैं। अभिभावक घर पर परेशान होते हैं और पूरा ट्रैफिक सिस्टम ध्वस्त हो जाता है।
- दफ्तर और रोजी-रोटी का नुकसान: डायवर्जन के कारण जो सफर 15 मिनट का होता है, उसे तय करने में लोगों को दो-दो घंटे लग जाते हैं। नौकरीपेशा लोग दफ्तर के लिए लेट होते हैं, दिहाड़ी मजदूरों और ऑटो-रिक्शा चालकों की कमाई मारी जाती है, और पूरा शहर एक अघोषित बंधक जैसी स्थिति में आ जाता है।
सजग नागरिक का सवाल: सुरक्षा निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन क्या किसी वीआईपी की सुरक्षा आम इंसान की जिंदगी से बड़ी हो सकती है? लोकतंत्र में जब 'जनता ही जनार्दन' है, तो उसी जनता को सड़क किनारे खड़ा रखकर, उसके रास्ते रोककर किया जाने वाला स्वागत किस हद तक जायज है? तकनीकी के इस दौर में जब एडवांस ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम मौजूद हैं, तब भी घंटों पहले रास्ते बंद कर देना प्रशासनिक नाकामी और सामंती मानसिकता को ही दर्शाता है।
निष्कर्ष और निवारण: आधुनिक युग में क्या है इसका समाधान?
आज जब हम 21वीं सदी के डिजिटल और हाई-टेक भारत में जी रहे हैं, तब भी दौरों का यह पुराना, सामंती और थकाऊ ढर्रा बदलना बेहद जरूरी है। इस पूरी समस्या और जनता की परेशानी का एक बेहद व्यावहारिक निवारण हो सकता है:
- ऑनलाइन प्रचार-प्रसार और वर्चुअल उद्घाटन (Virtual Centralization): आज के दौर में जब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और 5G तकनीक मौजूद है, तब करोड़ों रुपए खर्च करके और लाखों लोगों को असुविधा में डालकर भौतिक रूप से उपस्थित होना जरूरी नहीं रह गया है। सरकार अपनी योजनाओं का प्रचार-प्रसार डिजिटल माध्यमों, सोशल मीडिया और वर्चुअल रैलियों के जरिए कर सकती है। बटन दबाकर दिल्ली या लखनऊ से ही देश-प्रदेश के किसी भी कोने में प्रोजेक्ट का शिलान्यास या उद्घाटन किया जा सकता है।
- 'शांति से आएं और शांति से जाएं' (No-Frills VIP Movement): अगर मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का जमीन पर आना बहुत अनिवार्य भी हो, तो उनका दौरा बिल्कुल सादगी भरा होना चाहिए। न रातों-रात सड़कों पर दिखावटी पुताई हो, न बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर पैसा पानी की तरह बहाया जाए, और न ही रूट डायवर्ट करके जनता का रास्ता रोका जाए। वीआईपी आएं, अपना काम करें और बिना किसी शोर-शराबे या तामझाम के शांति से चले जाएं।
- सख्त 'नो-ट्रैफिक ब्लॉक' पॉलिसी: सुरक्षा को आधुनिक तकनीकों (जैसे ड्रोन निगरानी और एडवांस रूट मैपिंग) के जरिए संभाला जाना चाहिए, न कि बैरिकेड लगाकर सड़कों को घंटों बंद करके। एम्बुलेंस और स्कूल बसों के लिए 'कंपलसरी ग्रीन कॉरिडोर' होना ही चाहिए, चाहे वीआईपी का काफिला ही क्यों न गुजर रहा हो।
आखिरी बात:
लोकतंत्र में जनता टैक्स इसलिए देती है ताकि उसका जीवन आसान हो सके, इसलिए नहीं कि उसके पैसों से ही उसके लिए मुसीबतें खड़ी की जाएं। नेताओं को अब 'वीआईपी कल्चर' की इस रवायत को छोड़कर डिजिटल और जनता-अनुकूल (People-Friendly) रवैया अपनाना ही होगा, तभी सही मायनों में "जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन" सार्थक हो सकेगा।
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क्या आपको भी लगता है कि डिजिटल युग में वीआईपी दौरों के इस भारी-भरकम तामझाम और रोड डायवर्जन को पूरी तरह बंद कर दिया जाना चाहिए? क्या नेताओं को अब वर्चुअल रैलियों और सादगी भरे दौरों का रुख करना चाहिए? इस फिजूलखर्ची और जनता की परेशानी पर आपका क्या सोचना है, नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमें जरूर बताइए!
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